Tuesday, February 7, 2017

चुप्पी


आज फिर दिल उतना ही बेचैन सा महसूस कर रहा था और मैं उतना ही खामोश | ये तो अक्सर ही होता है मेरे साथ , एक चुप्पी सी होती है ज़ुबान पर और अंदर ही अंदर ना जाने कितने तूफान आते रहते हैं | तुम कहाँ समझ पाओगे ये तूफान पालने का दर्द | बहुत ताक़त लगती है खामोश रहने में भी | दिल के तूफान अक्सर ज़ुबान से अल्फ़ाज़ उड़ा ले जाया करते हैं, मानो कोई पुरानी दुश्मनी हो |
तुम्हारे साथ रहते रहते मैं ना जाने कब करीब गया था तुम्हारे | बात फिर वहीं आके रुक गई थी जहाँ अक्सर रुक जाया करती है | आगे सिग्नल लाल था और मैं चाहता था कि मैं उस लाल बत्ती को पार कर के तुम तक पहुँच जाऊं | उस आवारा लड़के सा जो कभी लाल बत्ती की परवाह नहीं करता | मगर ये कहाँ मुमकिन था, अक्सर हम इतने बँधे होते हैं उसूलों से कि दिल के आवारापन का कत्ल कर डालते हैं | जी तो चाहता था जो बातें दिल के कॅसेट मे रेकॉर्ड कर रखी थी चला दूं तुम्हारे सामने | सब कुछ वैसे का वैसा ,जैसा मैं अभी महसूस कर रहा था तुम्हारे लिए | बोल दूं हर वह बात जो ना जाने कितने दिनों से दबा रखी थी |
कहीं ना कहीं मेरी खामोशी तुम्हें भी तो परेशान कर रही थी | तुम्हें देख कर मुझे अक्सर लगता था के बहुत सवाल हैं तुम्हारे दिल में जो तुम पूछना चाहती हो | तुम्हारे चेहरे को पढ़ना मेरी आदत में जो शुमार हो गया था | मगर ना तुमने कभी कुछ कहा ना मैंने | कही तुमने ये तो नहीं मान लिया था कि मैं ऐसा ही हो गया हूँ, खामोश सा |
अब बातों की जगह हेडफोन्स ने ले ली थी| हँसी की आवाज़ कही हेडफोन्स के तारों मे उलझ कर रह गई थीचिट्ठी बिना पढ़े एक बार फिर जला दी गई थी, कितने मासूम लफ्ज़ बे-मौत मारे गए थे | दफ़्न कर दी गई थी वह कॅसेट जिसमे सारी बातें रेकॉर्ड थी जो हम एक दूसरे को नहीं बता पाए थे | दिल का तूफान और तेज़ होता चला गया था और खामोशी आहिस्ता आहिस्ता अंधेरे सी अपना आगोश फैला चुकी थी |


© सार्थक सागर










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